*वाचिक परम्परा केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह समकालीन साहित्य और समाज को समझने की एक सशक्त कुंजी*

*वाचिक परम्परा केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह समकालीन साहित्य और समाज को समझने की एक सशक्त कुंजी*

*वाचिक परम्परा केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह समकालीन साहित्य और समाज को समझने की एक सशक्त कुंजी*

रायपुर 23 जनवरी 2026/ रायपुर साहित्य उत्सव 2026 के अंतर्गत “आदि से अनादि तक” थीम पर आयोजित साहित्यिक कार्यक्रमों की श्रृंखला में लाला जगदलपुरी मण्डप में द्वितीय सत्र का आयोजन किया गया। इस सत्र में “वाचिक परम्परा में साहित्य” विषय पर गहन, विचारोत्तेजक एवं सार्थक परिचर्चा संपन्न हुई, जिसमें भारतीय साहित्य की मौखिक परम्पराओं की ऐतिहासिक भूमिका और समकालीन प्रासंगिकता पर व्यापक विमर्श किया गया।

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इस परिचर्चा में प्रख्यात साहित्यकार श्री  रुद्रनारायण पाणिग्रही, श्री शिव कुमार पांडे, डॉ. जयमती तथा श्री सुधीर पाठक ने अपने विचार साझा किए। सत्र की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. महेन्द्र मिश्र ने की। वक्ताओं ने अपने संबोधन में वाचिक परम्परा की विविध विधाओं और उनके साहित्यिक महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला।

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अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. महेन्द्र मिश्र ने कहा कि वाचिक परम्परा केवल अतीत की धरोहर नहीं है, बल्कि यह समकालीन साहित्य और समाज को समझने की एक सशक्त कुंजी है। उन्होंने कहा कि बदलते समय में वाचिक परम्पराओं का संरक्षण, दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी तक उनका संवेदनशील हस्तांतरण आज की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता बन गया है।

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वक्ताओं ने वाचिक परम्परा को भारतीय साहित्य की मूल धारा बताते हुए कहा कि लोकगीत, लोककथाएँ, कहावतें, मिथक और जनश्रुतियाँ सदियों से समाज की सांस्कृतिक स्मृति को संरक्षित करती आई हैं। उन्होंने कहा कि लिखित साहित्य के उद्भव से पूर्व वाचिक परम्परा ही ज्ञान, इतिहास, जीवन मूल्यों और सामाजिक अनुभवों के संप्रेषण का प्रमुख माध्यम रही है, जिसने पीढ़ी दर पीढ़ी सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखा है।